लंदन की एक शाम -1
हमारी सफलता के बाद, हम एक अद्वितीय स्थिति में होते हैं, जहां हम आपस में शांति से बैठे हैं और अपनी जीवन की यात्रा पर विचार करते हैं। रानी मेरे साथ बैठी हुई है और हम एक दूसरे के साथ बिताए गए समय को याद करते हैं।
रानी (हंसते हुए): “आर्जुन, तुम्हारी कुछ आदतें आजतक नहीं बदली , खरोच खरोच कर निकालें जा सकने वाली चीजें बहोत आकर्षित करती हैं तुम्हे “
अर्जुन (मुस्कान के साथ): “पता है रानी, तुम्हारा साथ होना मेरे लिए सबसे बड़ी कमजोरी बन गया था। तुम्हारे साथ के बिना मेरा जीवन अधूरा होता। तुम्हरे अज्ञात में एक ताकतवर खिचाव का अनुभव किया है मैंने “
रानी: “हमने न केवल शहर की सच्चाई को खोजा, बल्कि हमने एक दूसरे को भी समझा।”
रानी: “और तुम्हारे बिना मेरी कहानी अधूरी होती।”
हम एक-दूसरे की आँखों में देखते हैं और हंसते हैं, जानकर कि हमने न केवल अपना शहर बदला है, बल्कि अपने बीच बनाए गए इस अनूठे रिश्ते को भी बहोत अलग अंदाज में ग्रो किया है।
हम अपने जीवन की नई शुरुआत की तैयारी करते हैं, जानते हुए कि हमारी कहानीअब शहर के अंदर नहीं, बल्कि हमारे दिलों के बीच हो रही है।
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Toggleपहली मुलाकात
सर्दियों के दिनों में, एक दिन जब धूप ने मधेपुरा को अपनी बाहों में लपेटा हुआ था, मैं और रानी एकदूसरे से अनजान सिंहेश्वर से वापस मधेपुरा जा रहे थे। बस से उतरते ही हमने नजरें मिलाईं, और एक-दूसरे की ओर हंसते हुए बढ़ते हुए एक ऑटो में बैठे। वो हंसी बहोत अव्यवहारिक थी ऐसे दो अजनबियों के बीच मगर शायद हमदोनो की हंसी एकदूसरे के लिए नहीं थी बस आँख मिल गयी तो वो भी हंस रही थी और मैं भी |
उसे लगा की मैं उसे जनता हु और मुझे लगा की वो मुझे जानती है |
ऑटो की सीट पर बैठते ही, हवा में सर्दी का मिजाज छाया हुआ था , मैंने उससे पूछा की क्या वो मुझे जानती है… मगर उसने कहा की नहीं | फिर मैंने बताया की मैं अर्जुन हु और कुछ दिन पहले ही मधेपुरा आया हु |
वो लड़की : “तो, आर्जुन, तुम बैंगलोर से मधेपुरा कैसे आए?”
आर्जुन: “रानी, यह बहुत बड़ी कहानी है। मैं एक इंजीनियर हूँ और यहां आया हूँ कुछ दिन छुट्टी बिताने “
वो लड़की(मुस्कुराते हुए ): “ओह ओके ? बैंगलोर से लौट कर यहाँ कैसा लगता है ?
वो इतना बड़ा कॉस्मोपोलिटन और ये एक छोटा सा शहर “

आर्जुन: “हां, यह सच है। मगर बड़ा या छोटा होना कोई ऐसी खासियत नहीं जिसके बल पर किसी शहर को जज कर सकें ।”
वो लड़की : “बिलकुल ठीक बात मैं भी यही मानती हु “
आर्जुन: “वही तो देखिये आप भी ऐसा ही समझती हैं शायद इसलिए आपसे मुलाकात हो गयी ।”रानी (हंसते हुए): “हाँ, लगता है कि यह कहानी अभी शुरू हुई है।”
ऑटो की सवारी में, हमने एक दूसरे के सपनों की ओर मुड़ते हुए एक नए यात्रा का आरंभ किया। शहर की सच्चाई की ओर हमारी कदम बढ़ते जा रहे थे, और इस नए मित्रता के साथ हम एक नये अध्याय की शुरुआत कर रहे थे।
उसने बताया की उसका नाम रानी है |
दूसरी मुलाकात:
ठंड की बूंदें गिर रही थीं, और शहर का बाजार घने कोहरे से ढ़का हुआ था। जनवरी की सर्दी में, जब हर कोने में ठंडक बसी हुई थी, मैं और रानी शाम के समय मधेपुरा के बाजार में मिलते हैं। रानी, जो एक मेहनती और जिज्ञासु लड़की थी, कोई तलाश में बाजार में घूम रही थी। रानी को चौकाने के लिए, मैंने उसे हंसते हुए पुकारा ।
आर्जुन: “रानी, कैसा चल रहा है? इतनी ठंड में यहां क्या कर रही हो?”
रानी (मुस्कराते हुए): “आर्जुन, दुनिया भर में कहीं भी हो, जिज्ञासा हमेशा कुछ नया खोजने के लिए बढ़ती रहती है। मैं यहां बाजार में घूम रही हूँ, यह देखने के लिए कि लोग कैसे इस सर्दी में अपनी जिंदगी जी रहे हैं।”
आर्जुन: “बिल्कुल, तुम्हारी जिज्ञासा सचमुच अद्भुत है। कोहरे में छिपे रहस्यों को खोजना तुम्हारी स्वभाविकता बन गई है।”
रानी: “धन्यवाद, आर्जुन। और तुम यहां क्या कर रहे हो?”
आर्जुन: “मैं भी शायद किसी रहस्यमय धुंध की खोज कर रहा हूँ, और मेरी यात्रा मुझे इस बाजार में ले आयी है।”
रानी: “वाह, यह बहुत दिलचस्प है। क्या तुम्हें कुछ मिला है?”
आर्जुन: “हाँ, कुछ स्पष्ट नहीं मिला है अभी तक, लेकिन मैं आशा करता हूँ कि हम मिलकर कुछ नया खोज पाएंगे।”
रानी: “मैं भी तुम्हारी यात्रा में सहायक बनना चाहती हूँ, आर्जुन। हम एक-दूसरे की मदद करेंगे और इस धुंध और भीड़ के राज़ को खोलेंगे।”
बाजार में घूमते हुए, हम एक दूसरे के साथ और भी करीब हो रहे थे, जब तभी हवा में ठंडक का आभास हुआ। एक छोटे से दुकान के पास खड़े होकर, हमने एक दूसरे से हाथ मिलाया , हाथों की गर्मी बहोत सुकून दे कर चली गयी |
रानी (मुस्कराते हुए): “आर्जुन, हमें इस कोहरे में कुछ गर्म पिने की जरुरत है ।”
आर्जुन (मुस्कराते हुए): “हाँ, रानी, तुम बिल्कुल सही कह रही हो। हमें इस सर्दी में अपने आप को गर्म रखना बहुत महत्वपूर्ण है।”
हमने एक चाय स्टाल पर खड़े होकर चाय पी और फिर वो मुस्कुराते हुए आँखों से ओझल हो गयी
तीसरी मुलाकात
अगले दिन शाम का समय आया, और मैं अपने घर से बाहर निकलकर सुनसान सड़कों पर चलने लगा। ठंडी हवा और धूप की किरणें मेरे चेहरे को छू रही थीं, जो मेरे दिन को शांति और सुकून से भर देती थीं। बयपास रोड़ के किनारे की ओर बढ़ता हुआ, मुझे लगा कि एक छोटी सी गली से कुछ अजीब सी धुंध आ रही है।
मैंने धीरे से कदम बढ़ाते हुए उस गली की ओर बढ़ा, और वहां पहुंचकर मैंने देखा कि वहां बहुत गहरी धुंध छाई हुई थी, जैसे कि कोई रहस्य छिपा हुआ हो।
चलते-चलते, मुझे एक परछाई दिखाई दी, और मैंने समझा कि वह रानी हो सकती है। मेरी इनट्यूसन ने मुझे बताया कि इस धुंध में कुछ बातें छुपी हो सकती हैं, और मैंने नजरें फेरी ताकि उसे देख सकूं।
रानी का चेहरा मेरे लिए अजीब सा था, जैसे कि वह इस धुंध में छिपे कुछ बड़े सरप्राइज का हिस्सा थी।
मैंने धीरे से उसकी ओर बढ़ते हुए कहा, “रानी?”
रानी ने मुझसे मिलकर हंसते हुए कहा, “अर्जुन, तुम यहां कैसे?”
उसकी आँखों में विचार और आश्चर्य था, जैसे कि उसने भी मेरे साथ कुछ अद्भुत कोण देखा हो। मैंने जवाब दिया, “मैं इस रहस्यमय धुंध में भटक रहा हूं। तुम क्या कर रही हो यहां?”
रानी: “मैं तो बस धुंध बन के तुम्हारे चारो और छायी हुई थी पता नहीं कैसे तुमने मुझे देख लिया “
फिर हमलोगों की कई मुलाकातें हुईं – पर रानी ने अपने आप को कभी बहुत जाहिर नहीं किया, कभी-कभी वह बोलती थी – “मेरा आसपास जो अज्ञात तुम्हें नजर आता है, वही तुम्हें मेरी ओर खींच लेता है… क्यों उसे तोड़ने की चाह है तुममें?
वह हंस पड़ती और बोलती है, “देखो तो मेरी हंसी कैसी कुहासों को भेद कर तुम्हारे पास आती हूँ, धूप है… इसे महसूस करो, अर्जुन।
किसी अज्ञात को तोड़कर उस रहस्य को पाकर भी क्या हो जाएगा।”
फिर वह बोली, “कल से नहीं मिल पाऊंगी।
“क्यों, क्या हुआ “- मैंने पूछा
जिम्मेदारियों को उठाने का कर्तव्य अब मुझे कहीं और खींच रहा है”, उसने जवाब दिया |
मैंने कहा पर कब तक, क्या मैं कुछ मदद कर सकता हूँ। उसने हँसते हुए कहा, “तुम्हें जरूर बताऊंगी, अगर मेरे वास्ते ना हुआ तो… पर तुमसे मिलूंगी जरूर, तुम्हें खोने नहीं दूंगी।”
फिर 4 साल बीत गए।
मैं ज़मीन से हजारों फीट ऊपर बैंगलोर से लंदन जा रहा था। तभी एयरहोस्टेस ने आकर कहा कि कोई व्यक्ति आपसे सीट एक्सचेंज करना चाहते हैं। एक्सचेंज करने वाले की भी विंडो सीट ही थी। मैंने उस व्यक्ति को सीट दे दी और उसकी सीट पर गया तो देखा विंडो सीट पर एक लड़की बैठी हुई है। मैंने एयरहोस्टेस को कहा कि मैंने एयरहोस्टेस से कहा की मैंने विंडो के बदले विंडो सीट एक्सचेंज किया था पर ये सीट तो अवेलेबल नहीं हैं ।
वह लड़की बोली बस 5 मिनट में अपना डिनर खत्म कर लूँ, मैंने कहा ओके।
मैं उसके बगल में बैठ गया, उसने कहा बस लंदन तक ही या उससे आगे…
मैंने बिना उसके और देखे बोला, डो लंदन में रुक के वहां से बर्लिन।
वही रहते हो क्या अब?
मैंने कहा-“नहीं 24 को वापस बैंगलोर लौट जाऊंगा।”
और मधेपुरा कब जाओगे? उसमें पूछा। मैं चौंक गया।..
मैंने हल्की रौशनी में उसका चेहरा पहचानने की कोशिश की
पर वह झट चेहरा छुपा के बोली- “तुम हमेशा कुछ खोजने में लग जाते हो… जैसे अभी कोई कनेक्शन खोज रहे हो, तुम कनेक्शन से करीब तो आ जाओगे पर उसके जो प्रत्यक्ष हैं |
जो अप्रकट और अय्याक्त हैं वही तो आकर्षण का कारण है तुम्हारे कौटूहल का, वह तो अभेद्य ही रहेगा”
फिर उसकी हंसी मेरे कान से टकराई और उसमें अपना चेहरा मेरे सामने कर दिया।
मैंने कहा- “आरे!!” पर वह बीच में ही मेरी बात काटते हुए बोली- “हाँ मैं इरविना और कोई नहीं।”
“पर तुम तो”…
“क्या तुम तो “- उसने बीच में ही टोकते हुए कहा – “तुम्हें एक पुल की आवश्यकता पड़ती है, कोई रास्ता ज़रुरी तो नहीं कहीं पहुँचने के लिए.. तुम इरविना तक आ गए हो अब पीछे छूटे हुए रास्तों को क्यों जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं??”
“तो क्या रानी बस एक पुल थी इरविना तक आने के लिए ?”- मैंने पूछा
“अच्छा चलो तुम मुझे रानी बुला सकते हो। अब ज्यादा परेशान ना हो।
फ्लाइट में तुम पर नजर पड़ी तो बगल वाले भाई साहब को कन्विंस किया की वो तुमसे अपनी सीट एक्सचेंज कर लें
मैंने पूछा- ” तुम यहाँ कैसे?
वह बोली वह लंदन में ही रह रही है लास्ट 2 इयर्स से। नेक्स्ट मंथ इंडिया लौट जाएगी।
फिर हमलोग लंदन में उतरे वह अपने हॉस्टल चली गई मैं होटल में आ गया। इवनिंग में उसका फ़ोन आया कि वह मुझसे मिलने आ रही है। फिर होटल के टैरेस पर बैठकर हम लोग से देर तक बातें की…
लंदन की वही एक शाम -2
मधेपुरा से शुरू हुई कहानी लंदन तक आई, बहुत थी… मगर कैसे ये शायद एक रहस्य ही था अब तक। तुम मधेपुरा कब गई थीं लास्ट टाइम? बहुत दिन हुए… मैंने पूछा कितना… उसने आकाश को देखते हुए कहा “जितना मैंने सोचा नहीं था” पर तुम बताओ… कहाँ रहते हो… क्या करते हो आजकल। फिर धीरे-धीरे उसने रात को बहुत रहस्यमयी बना दिया, मैं उसके इर्द-गिर्द एकदम खो गया था… वह थोड़ी उदास सी लगी मुझे। मैंने पूछा “कोई बात है जो तुम्हें मन में है और तुम बोलना चाहती हो” उसने कहा “कुछ बोलना चाहूँ तो तुम हो जिसके पास मैं सबसे पहले जाऊंगी” “पर अगर मैं एक रहस्य हूँ तो तुम्हारा कौटुहल ही मुझे पूर्ण बनाता है” “तुम्हारे प्रश्न मुझे मेरे होने का अहसास करते हैं” वह मेरे पास आ रही थी मगर मैं अपने प्रश्नों के पिंजरे में कैद था।
“तुम ना मेरे पीछे आए ना ही मुझे किसी बंधन में डालने की कोशिश की..”
“मुझे हमेशा ऐसा लगा कि तुम्हारे आसपास मैं आज़ाद होती हूँ जैसे एक फ्री बर्ड.. मैंने तुम्हे छूने की कोशिश की है अर्जुन मगर तुम एक आकाश की ऊपर ही नजर आए”
ऐसा लग रहा था कोई रहस्य आज अपने आप को प्रकट कर के किसी घुटन से बाहर आना चाह रहा हो ।
वह चुप हो गई। वह चाहती थी मैं आज उससे हर राज जान लूँ |
उसकी गहरी सांसे इस बात की गवाह थी इतने बरसों तक सीमाओं के ना टूटने से उसके मन में एक विस्वास पैदा होगया था जो उसे मेरे नजदीक ला रहा था |

