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साहुगढ़ पुल्ला पर भगैत देवता से साक्षात्कार

सिंघेश्वर से लौटते समय मैंने गाडी रामरहीम रोड की और घुमा दिया | 
वैसे वो कोई अनुकूल  समय नहीं था पर बचपन की यादें मुझे उधर खींच लायी थी. 
मेरे साथ वाली सीट पर  मणि बैठी हुई थी , तेज हवा उसे गालों से टकरा कर उसके बालों को उदा रहे थे | 
वो कही खोयी हुई थी | 
फिर अचानक वो पूछ बैठती है- “कुछ सुनाई दे रहा है तुम्हे। . क्या है वो “
“कुछ भी तो नहीं “- मैंने कहा |  
“अरे थोड़ा गौर से सुनो ढोल की आवाज और हो  हो  हो  की लगातर आवाज “- उसने मुझेसे जोर देकर कहा | 
मैंने थोड़ा ध्यान लगा के सुनने की कोशिश की तब तक गाड़ी आवाज की ही दिशा में काफी आगे जाकर मेन रोड पर पाहुहक गयी थी | 
मैंने आवाज को पहचान लिया | 
मैंने कहा – “ये भगैत देव का खेला हो राह है कही | “
“भगैत देव !! और खेला मतलब ??”- वो कुछ समझी नहीं | 
असल में हो हो  हो  की आवाज पश्चिम दिशा की और से आरही थी और दुर कही भगैत खेला हो रहा था |  इन शब्दों में कोई असम्मान की भावना नहीं थी , बल्कि अस्थानिये लोग इसे भगैत खेलना ही बोलते हैं |   मैं तो बचपन से ही इस रहस्य्मयी किन्तु एक ताकतवर अनुष्ठान का साक्षी रहा था | 
“कुछ नहीं अस्थानिये लोग एक अनुष्ठान पूजा करते हैं , उसी की आवाज है ये “
“साउंड्स िनेटेरस्टिंग “-  मणि ने कहा-“तुमने कभी देखा यही अपनी आँखों से ?””कई बार , मगर बरसों बीत गए अब तो “- मैने कहा |

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